Sunday, October 26, 2014

NOISE

A house
In a peaceful locality
full of noise
people yelling
shouting, crying
The clutter
the mess,
the Sound - painful
to the ears,
to the mind and the soul
Worst - we 
become
the Noise, the Pain
Now, bracket-out
the sound
To listen to silence
To get to quietude

Thursday, October 17, 2013

तुम्हारे लिए

गिरते, पड़ते, लुढ़कते
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।  

Wednesday, October 9, 2013

मैं लिखती हू

मैं आज फिर लिख रही हूँ 
मैं जानती हू मेरी लेखन में 
कोई रचनात्मक  बात नहीं  होती 
मैं जानती हू मेरी लेखन में  
कोई बडी बात भी नहीं  होती
मैं जानती हू मैं कोई क्रांतिकारी बात
भी नही कह पाती
मैं तो बस लिखती हूँ . 
मैं लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से नाता बना रहे
मैं  लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से संवाद होता रहे
मैं लिखती हूँ  कि मेरी 
सोच मुझसे दूर न हो जाये 
मैं लिखती हूँ  कि कहीं कुछ 
क्षणिक भावनाओं की अनदेखी न हो जाये 
मैं लिखती हूँ कि 
एक दिन जब पन्ने पलटने बैठूं 
तो खुद को पढ़ सकूं 
बस इसीलिये
मैं  लिखती हूँ 




Friday, September 27, 2013

Mera Shehar Allahabad

kisi ne mujhse poocha
is shehar mein aur kya hai dekhne ko
main sochne lagi
bahut kuch yaad bhi aya
lekin kya karein
yaadein dikha nahi sakte
shehar jo yaadon mein basta raha
bahut dhoondha 
mila nahi
wo aitihasik ped kahin kho gaya tha
jisne apne kandhon par
maut ko saha tha
kahin wo raste
shehar ke navinikaran mein
ojhal ho gaye the,
jinpar mera bachpan chalta tha
aur to aur
haathi park ke haathi ki soond bhi toot rahi thi.
itihas ke chehre par
kahin bahut kaai lagi thi
to kahin chehra tha hi nahi.
ab koshish karti hu kisi tarah 
apne andar is shehar ko zinda rakhne ki.

raat

zara yahan bhi rukte hain
kya hoga,
thodi der hi to ho jayegi,
kya hoga zyada se zyada,
bus chhoot jayegi!
samay par laut nahin payenge!
raat ke sukoon ko main 
yahin mehsoos karna chahti hu
ruk kar, chalkar nahin,
raat kaatni nahin, jeeni hai,
kuch pal ke liye hi sahi.
raat to le leti hai khud par ilzam 
kale hone ka,
jurm ko sheh dene ka,
jeevan ke ant ka pratik hone ka
bhoot pishaach jagane ka
phir bhi hai mujhko raat lubhaati
chaand ho jata hai mujhme shamil
chal padta hai mere saath
karke mujhko azad
din ke dhong dikhawon se
dincharya ke niyamon aur ashaaon se
arre dekho! baton baton mein subah ho gai
ao ab sapne se nikalte hain
aur phir se atma chhor sharir mein palte hai.




Thursday, August 29, 2013

उड़ता हुआ पत्ता

मुझे  बहुत तेज़ चलना था 
उड़ जाना था
पलटकर कभी नहीं देखना था।  
मैं अपना रास्ता जानती थी 
दूर तक सोच लेती थी। 
जीवन की राहों को अपने मस्तिष्क पर 
हाथों की लकीरों की तरह खींच लेती थी।  
कुछ दूर तक  उन लकीरों  के सहारे आगे बढ़ी भी। 
गुमान भी किया 
कि जैसा सोचा वही हुआ। 
फिर एक दिन जीवन की दीवार पर लगी 
एक ऐसी खिड़की खुली 
जिसपर मेरा ध्यान नहीं गया था। 
बहुत तेज़ हवा चलने लगी 
मौसम ठीक नहीं था। 
ऐसा लगा जैसे 
किसी उड़ते हुए पत्ते को एक तेज़ आँधी ने 
हवा में लपेटकर किसी दीवार पर 
जा पटका हो और वो 
चाह कर भी उस दीवार से 
छूट न पा रहा हो हवा के जोर के कारण। 
आँधी थमी तो उस पत्ते की तरह 
मैं भी धीरे से दीवार से खिसक कर 
ज़मीन पर बैठ गई। 
हवा के थपेड़ों का असर 
हमेशा महसूस होता रहा 
लेकिन 
मैं ठहर कर चलना सीख गई। 


Tuesday, July 9, 2013

मन की सुविधा

कभी मन चाहे पास रहें सब 
कभी मन चाहे दूर चलें कहीं 
कभी मन चाहे जीत जायें जग  
कभी मन चाहे छोड़ चलें सब 
कभी मन चाहे प्यार का बंधन 
कभी मन चाहे बेपरवाही 
भी मन चाहे ज्ञानी बनना 
कभी मन चाहे चरम अँधेरा 
कभी मन चाहे विस्तार अपार 
तो कभी मन चाहे सिमट के रहना 
कभी मन चाहे सब सुखसाधन 
कभी मन हो जाये वैरागी 
कभी मन चाहे भावुक होना 
तो कभी मन चाहे तटस्थ ही रहना 
देखो ये मन भी तो एक सुविधा ही है 
जो विकल्प दिलाता रहता है 
पसंद बताता रहता है 
सीमाएं निर्धारित करता है 
फिर अकेला, दोराहे पर छोड़ जाता है 
हाँ लेकिन ये भी तो सच है
सुविधा मन की, सबके पास कहाँ होती है। 

Thursday, December 6, 2012

तुम हो मेरे होने में

तुम मेरे चिर चिंतन में 

तुम मेरे जग जीवन में 

तुम मेरे संसाधन में 

तुम मेरे आंगन में 

तुम हो मेरे होने में 


तुम मेरे आलिंगन में 

तुम मेरे स्वर स्पंदन में 

तुम मेरे अवलोकन में 

तुम मेरे अल्ल्हड़पन में 

तुम हो मेरे होने में 


तुम मेरे आह्लादित मन में 

तुम मेरे जीवन दर्शन में 

तुम मेरे आकर्षण में 

तुम मेरे क्षण क्षण में 

तुम हो मेरे होने में।

Sunday, December 2, 2012

नानी तुम मेरी दादी होती

नानी तुम मेरी दादी होती
तो न जाना पड़ता तुमको मेरे घर से,
न सुनने पड़ते दुनिया के ताने,
ज़्यादा हक़ जमा पाती मैं तुम पर,
न करता आना कानी
वो बैंक वाला,
तुम्हारा अकाउंट खुलवाने में,
मेरा पता तुम्हारा पता होता,
न बनना पड़ता तुम्हे मेरा किराएदार
पता प्रमाण दिखाने के लिए,
मैं न तरसती रहती
तुम्हारे लड्डुओं के लिए
न तरसती रहती मैं
भरे पेट में भी तुम्हारी थाली से
एक निवाला चखने के लिए
न तरसती रहती मैं
तुमसे दो बातें करके सोने के लिए
नानी सुनो ना
या तो तुम इतनी अच्छी न होती
या तुम मेरी दादी होती। 


शामिल होना चाहती हूँ

मैं शामिल होना चाहती हूँ
खुशियों में और उपहारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
गीतों में और फनकारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
अपनों में और ज़िम्मेदारों में
मगर नहीं रहना चाहती मैं
पहरों और पहरेदारों  में
नहीं रहना चाहती मैं
कुपोषित सोच के गलियारों में
ये कैसे संभव होगा
नहीं जानती मैं
फिर भी इच्छा ये  कैसी
जो मोल भाव नहीं कर पाती
नियमों के तर्क नहीं समझ पाती
बस तंग सा छोड़ जाती है


Friday, October 26, 2012

गुम होते इशारे

दिन बदल रहे हैं
माइने बदल रहे हैं
संकेत सब गुम हो रहे हैं
अब न किसी के आने की खबर
कोई लाता है
न किसी के चले जाने का
इशारा कहीं से आता है
 ज़माने हो गए कौओं
को सुने
जिनके बोलने पर हम कहते थे
देखो कोई मेहमान ज़रूर घर आता है
चील, गिद्ध का मंडराना भी याद आता है
जो किसी के चले जाने पर
मायूसी का एहसास करा जाता था
अब तो बस शहरों में
ऊंची ऊंची ईमारतें हैं जिनपर से
कोई न कोई गम का मारा
कहीं न कहीं छलांग लगाता
खबरों में नज़र आ जाता है  


Tuesday, October 9, 2012

दलित महिलाओं का चतुष्कोणीय संघर्ष - कुछ पन्ने घरों में काम करने वाली बिट्टन देवी के जीवन से

बिट्टन देवी उत्तर प्रदेश की चमार जाति में आती हैं। वे इलाहाबाद शहर के एक छोटे से मोहल्ले, फतेहपुर बिछुआ की रहने वाली हैं। बिट्टन देवी लगभग 62 वर्ष की होंगी। इनके जीवन पर एक नज़र डालने से योजनाबद्ध बहिष्कार के प्रपत्र और प्रक्रिया को समझने में कुछ आसानी होगी।
          बिट्टन देवी की कहानी से पहले हमें कुछ तथ्य ज़ेहन में रखना ज़रूरी है। दलित महिलाओं और उनके जीवन संघर्ष को देखने और महसूस करने के लिए हमें कहीं बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं। हमारे देश का बहुत बड़ा सच है कि हाशिये पर की गई जातियों वाली महिलाएं घरेलू कर्मचारियों के समूह का एक बड़ा हिस्सा हैं। ये सच बार बार कई रिपोर्ट्स और सर्वेज़ में उभर कर आता है। दलित महिलाएं कई प्रकार की मजबूरियों और बहिष्कार के चलते प्रतिष्ठित श्रम का हिस्सा नहीं बन पति हैं। वे मज्बूरन् दूसरों के घरों में काम करने लगती हैं, जहाँ न तो अभी तक न्यूनतम मजदूरी तय करने का कोई ठोस हल आया है और ना ही उनके और उनकी अगली पीढ़ी के लिए कोई विशेष योजनायें आयी हैं। यही कारण है की पीढ़ी दर पीढ़ी दलित महिलाएं और लड़कियां इसी काम में लगी रह जाती हैं।
          अब पूर्वोक्त कथनों को ध्यान में रखते हुए बिट्टन देवी के जीवन के कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं। बिट्टन देवी के जीवन से न केवल दलित महिला होना क्या होता है ज्ञात होगा बल्कि एक दलित महिला के जीवनकाल के अलग अलग पड़ावों पर संघर्ष किस तरह बढ़ता जाता है यह भी परिलक्षित होगा।
          बिट्टन देवी का कहना है की जब तक वो अपने मायेके में थीं तब तक उतनी बुरी स्थिति नहीं थी, हालाँकि उन्हें एहसास रहता था की वे एक निम्न जाति की लड़की हैं। कोई उन्हें तंग न करे और ये न सोचे की नीची जाति की होने के कारण उनसे कुछ भी करवाया जा सकता है, इसलिए वे अपने कपड़ों और रेहान सेहन के माध्यम से हमेशा संकेत देती थीं की वे गंभीर स्वभाव की हैं और उन्हें गलत न समझे।
         बिट्टन देवी का विवाह राजा राम नाम के आदमी के साथ हुआ। छह माह तक तो कुछ ठीक चला जीवन लेकिन उसके बाद राजा राम के चोट लगने के कारण वे काम काज करने में असमर्थ हो गए। अब बिट्टन देवी को कोई घर में नहीं रखना चाहता था। बिट्टन देवी को किसी ने एक अस्पताल में लगवा दिया। वहां उनकी ड्यूटी प्रसूति विभाग में लगती थी। उन्हें सैनिटरी पैड बनाने और धोने का काम दिया जाता था। वहां उन्हें 75 रुपये महिना मिलता था। बिट्टन देवी उसमे से पांच रुपये रखकर बाकी का 70 रपया अपने ससुराल वालों को दे देती थीं लेकिन ससुराल वालों को ये भी मंज़ूर नहीं था। उनका कहना था की या तो वो पूरा 75 रपये दे दिया करें या घर छोड़ कर चली जायें। बिट्टन देवी पूरा पैसा देने लगीं। कुछ समय बाद बिट्टन देवी ने एक बेटी को जन्म दिया और तब से तो उनकी परेशानियां और बढ़ गईं। ससुराल्वाले अब तो उन्हें घर में बिल्कुल नहीं रहने देना चाह रहे थे। उनके सिर पर भरी भरकम चीज़ों से वार करना और बाल पकड़कर सर्दियों में घर से बहार फ़ेंक देने का सिलसिला शुरू हो गया था। उनका अस्पताल वाला काम भी छूट हया था।
         एक बार बिट्टन देवी कुछ काम से बहार गई हुई थीं तब उनके ससुराल वाले उनके पति घर का एक एक सामान ख़ाली करके, सारा राशन और पैसा लेकर कहीं दूसरी जगह रहने चले गए। उन्हें लगा की बिट्टन देवी अब बिना राशन-पानी के अकेले अपने बच्चों के साथ कैसे रह पाएंगी और अपने मायेके चली ही जाएँगी। बिट्टन देवी के उस वक़्त तक और बच्चे हो चुके थे जो की बहुत छोटे थे। उनके पास बच्चों को लिटाने और उढ़ाने के लिए भी कुछ नहीं बचा था। बिट्टन देवी के पास कुछ बोरियां और अस्पताल से मिली एक आध साड़ी बची थी जिसे उन्होंने काट काट कर कथरी बनायीं बच्चों के लिए। बिट्टन देवी को अस्पताल के प्रसूति विभाग में सैनिटरी पैड बनाने के लिए साड़ियाँ मिलती थीं।
           अब बिट्टन देवी के पास न तो परिवार था और न पैसा जीवन यापन के लिए। उनके पास दूसरों के घरों में काम करने के इलावा और कोई चारा नहीं बचा था। बिट्टन देवी के अनुसार निर्धन दलित महिलाएं ज़्यादातर अपने आस पास के घरों में ही काम कर पति हैं। वे बड़े बाज़ारों या संस्थानों में काम के लिए बहुत कम जा पति हैं क्योंकि महिला होने के कारन वैसे ही उनकी कई सीमाएं होती हैं, ऊपर से दलित महिला के साथ तो लोग पशुवत व्यवहार करने से नहीं हिचकते। बिट्टन देवी ने घरों में काम करना शरू किया और धीरे धीरे उनकी बेटियों ने भी उनके साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। इसी प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर ये काम बहुत ही पूर्वनियत तरीके से लदता चला जाता है।
              बिट्टन देवी के पति राजा राम कुछ समय बाद लौट आये। वे जो कुछ भी कमा पति थीं, उनके पति पूरा का पूरा ले लेते थे। बिट्टन देवी याद करती हैं कि एक चीज़ के लिए राजा राम ज़रूर पैसा दे दिया करते थे। वे जब बीमार पड़ जाती थीं तब दवा का पैसा ज़रूर दिया करते थे, कि कहीं काम न बंद हो जाये बीमारी के कारण।
              बिट्टन देवी बताती हैं कि शादीशुदा होने के बाद भी वे कभी सौंदर्य सामग्री का इस्तेमाल नहीं करती थीं और उन्ही के शब्दों में कहें तो 'टिकली ' भी लगाकर सड़क पर नहीं जाती थीं। बिट्टन देवी का कहना है की नीची जाती का होने के कारन बहुत होशियार होकर रहना पड़ता है लोगों की नज़रों से बचने के लिए।
              बिट्टन देवी जिस मोहल्ले में रहती हैं वहां मुख्यरूप से अहीर, पासी, चमार, कहार और नाइ समुदाये के लोगों की आबादी है। इनके इलावा कुछ बनिया भी बसने लगे हैं। इस मोहल्ले में करीब करीब सभी दलित महिलाएं घरेलू कर्मचारी हैं - कुछ पूरे दिन की तो कुछ सुबह-शाम की। दलित पुरुष यहाँ के न के बराबर दूसरों के घरों में काम करते हैं। पुरुष ज़्यादातर 'टकाई' या 'जूता घांठने' का काम करते हैं।
               दलित महिला एक महिला होने के साथ साथ दलित होने, फिर शादी के बाद बहू होने और उसके इलावा योजनाबद्ध बहिष्कार के चलते चौतरफा मार झेलती हैं। हम अपने इर्द गिर्द इस प्रकार की घरों में काम करने वाली महिलाओं को अक्सर देखते हैं और बड़ी आम सी बात लगती है लेकिन जब हम उनमें से किसी के जीवन और उसके पीछे के कारणों का आंकलन करने बैठते हैं तब पर्त दर पर्त समाज की अतार्किक वास्तविकताएं सामने आने लगती हैं।
              वैसे तो नीची जाति का होना अपने आप में एक श्राप होता है फिर भी पुरुष कम से कम बाहर के काम करके खुली हवा तो महसूस कर पते हैं लेकिन घरेलु कर्मचारी जो कि ज़्यादातर दलित महिलाएं हैं वे अपने घरों से निकल कर सीधे दूसरों के घरो में वही काम करने चली जाती हैं।
              एक फैक्ट फैन्डिंग मिशन रिपोर्ट राजिस्थान की दलित महिलाओं पर निकली गई थी, "प्रोग्रैम ऑन विमेंस इकनॉमिक, सोशल ऐंड कल्चरल राइट्स" के द्वारा, 2008 में। उस रिपोर्ट में उल्लिखित था कि दुनिया के सभी देशों में ऐसे सम्प्रदाए हैं जो समाज में अपनी स्थिति के कारण लगातार हाशिये पर रखे जा रहे हैं और यह भेद-भाव दलित महिलाओं के सम्बन्ध में अत्यंत व्यवस्थित रूप में है, जो उनके निर्धन, दलित और महिला होने के नाते उनका बहिष्करण और उनकी परवशता सुनिश्चित करता है।
               मानवाधिकार परिषद् द्वारा 10 से 28 सितम्बर 2012  के बीच अयोजित इक्कीसवे सत्र में 'ईकोसॉक' (इकोनॉमिक ऐंड सोशल काउंसिल) से परामर्शी दर्ज़ा प्राप्त एक एन. जी. ओ., "इन्टरनैशन मूंवमेंट अगेन्स्ट ऑल फोर्म्स ऑफ़ रेसिज़म ऐंड डिस्क्रिमिनेशन", द्वारा लिखित बयान प्रस्तुत किया गया। इसमें कहा गया की असंगठित कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा बिल को बिना किसी विल्लंभ के पारित कर देना चाहिए और दलित महिला घरेलू कर्मचारियों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए। दलित कर्मचारियों व नियमों पर सन् 2011 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मलेन में दिए गए उपायों को भी लागू करने की मांग की गई है।
             
          

राम और पैग़म्बर कितने नाज़ुक

ये क्या नए तरीके हैं 
नफ़रत की आतिशबाज़ी के 
पहले पढ़ाओ धर्म-मज़हब के पाठ 
फिर उनकी ठेकेदारी के!
एक चित्र, एक फ़िल्म 
कर देती है क्या धर्म को इतना नाज़ुक 
कि बनाने पड़ जायें हथियार, राम का नाम 
और पैग़म्बर की आबरू बचाने के!
अब कुछ नए तरीके ढूँढो 
मनुष्यता वापस लाने के 
बेहिसाब आधुनिकता और 
बेलगाम धार्मिकता की भीषणता से 
निजात दिलाने के।

Sunday, September 30, 2012

Bhram

Meri pavitrata kasauti par
Mera gyaan kasauti par
Main tumhare ghar ki chaukhat se baahar
Mujhko chhoone se tumko shuddhi hawan karane honge
Tum ho samaj chalane wale
Aur main kul samaj ki daasi
Ye kaisa achha bhram hai chalaya
Jisko koi tod na paya
Lekin ab main awaz uthaungi
Apne kaano ko phir se, aadat dalwalo sunne ki
Aur thoda khud ko bhi badalo
Warna aage na badh paoge
Phir na kehna aagaah kiya nahi
Aur tum reh gaye jahan the wahi
Chhodo ye jaat-paat, ling-bhed ka bojh
Milkar kadam badhate hain
Ab ek naye samaj ka chitra banate hain.

Kaisa Dhokha

Tumhara kabza ganga jal par
Aur mere liye kuan bhi nahi!
Tumhare ghar ki aurat devi
Aur mere liye ek dua bhi nahi!
Tum rakhte ho unko bhi dhokhe mein
Rajkumari ka libaas pehanakar
Aur hum par se insani khaal tak utaarkar!
Lekin hum sab jaan chuke hain
Kaise tumne baantaa hai,
Apna rajya chalane ke khatir
Apni baat manvane ke khatir
Ab koi nayi baat nikalo
Ye sab tark purane hain
Karenge bahas barabar se hum
Bahut ho gai manmaani
Ab thoda sambhal bhi jao tum.

Tumhari Ghutan

Lo ye hawa chhoo gai tumko
Jo mujhko chhoo kar aayi thi
Ab kya hoga, kaise rukegi ye hawa
Kaise yahan tum saansein loge
Jahan main bhi saansein leti hoon
Baadal ko tum kaise rokoge
Jo mere yahan se pani lekar
Tum par ja barsa hai
Arre tum to ghut hi jaoge
Ab khud ko kahan tak bachaoge
Tumse nahi maangti main koi aashvasan
Main to khud mein poori hoon
Mere hone mein to shamil hain
dharti, gagan, sitare, bayaar
Tum inse bas bachte rehna
Ye sab mere aangan se hokar jaate hain.


Mera Astitva

Mere astitva par kabza sabka
Mera koi zor nahi
Mujhko jo chaha wo samjha
Kulta, uddhat, paapin
Khud se aankh milaakar dekho
Apne pratibimb se dar jaoge
Meri chhaya se kya darna
Main to bagal se nikal jaungi
Tumko to khud se hai bachna
Zeharila man mastishk tumhara
Tumko hi na das jaye.