दिन बदल रहे हैं
माइने बदल रहे हैं
संकेत सब गुम हो रहे हैं
अब न किसी के आने की खबर
कोई लाता है
न किसी के चले जाने का
इशारा कहीं से आता है
ज़माने हो गए कौओं
को सुने
जिनके बोलने पर हम कहते थे
देखो कोई मेहमान ज़रूर घर आता है
चील, गिद्ध का मंडराना भी याद आता है
जो किसी के चले जाने पर
मायूसी का एहसास करा जाता था
अब तो बस शहरों में
ऊंची ऊंची ईमारतें हैं जिनपर से
कोई न कोई गम का मारा
कहीं न कहीं छलांग लगाता
खबरों में नज़र आ जाता है
माइने बदल रहे हैं
संकेत सब गुम हो रहे हैं
अब न किसी के आने की खबर
कोई लाता है
न किसी के चले जाने का
इशारा कहीं से आता है
ज़माने हो गए कौओं
को सुने
जिनके बोलने पर हम कहते थे
देखो कोई मेहमान ज़रूर घर आता है
चील, गिद्ध का मंडराना भी याद आता है
जो किसी के चले जाने पर
मायूसी का एहसास करा जाता था
अब तो बस शहरों में
ऊंची ऊंची ईमारतें हैं जिनपर से
कोई न कोई गम का मारा
कहीं न कहीं छलांग लगाता
खबरों में नज़र आ जाता है
2 comments:
संकेत शून्य हम ज़रूर हुए हैं क्यों कि जाने-अनजाने मानस पर अंकित वो सभी परिचित एहसास गुम से हो चुके हैं. रिश्तों की मिठास और परस्पर की सुगंध भाग-दौड़ और तनाव की तपिश में कहीं भाप बन कर उड़ सी गई है. ज़रूरत है खुद को संजोय रखने की.
बहुत अच्छी पोस्ट है.
बधाई.
रूप
कौओं को लेकर हमारे मन में एक अच्छी छवि भी बसी है कि वे हमारे बहुत ही करीबी लोगों के आने के बारे में सूचना देते रहे हैं लेकिन अब लगता है कि वे शहरों की दूघिया रोशनी में चैंधिया गये हैं दूसरी ओर अब हमारे सम्बन्धों में ऊष्णता भी गायब होती जा रही है। यह कविता तेजी से उग रहे कंकरीटी जंगलों में मानवीय संवेदनाओं के गायब होते जाने और लोगों के लगातार अकेले पड़ते जाने के बारे में बहुत ही सहजता से बताती है।
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