गिरते, पड़ते, लुढ़कते
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।
4 comments:
marvelous...very much thought-provoking..Taru Ji.
अपने मन के भाव इस तरह भी व्यक्त हो सकते हैं इसकी तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... इन आँसुओं के उद्गम और उनकी अंतिम परिणिति, संवेदना के धरातल पर दोनो ही अदभुत हैं.
"रूप"
अपने मन के भाव इस तरह भी व्यक्त हो सकते हैं इसकी तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... इन आँसुओं के उद्गम और उनकी अंतिम परिणिति, संवेदना के धरातल पर दोनो ही अदभुत हैं.
"रूप"
ati uttam aur sundar vi4o ki abhivyakti main jo aapne aakash aur paatal ko ek kiya hai use sabdo men bayan karana muskil he nahi namumkin sa hai
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