Saturday, July 7, 2012

बुतों की दुनिया

जज़्बा तो था कि बहुत कुछ 
बदल के जायेंगे,
कुछ पगडंडियों को पक्का 
रास्ता कर के जायेंगे,
जिधर से जायेंगे
मुस्कुरा के जायेंगे,
लेकिन ये क्या हुआ की मुस्कुराने 
के लिए चेहरे बचे नहीं,
कुछ ज़माना हमे तो कुछ हम 
ज़माने को जचे नहीं,
फिर भी हैरानी है की 
कोशिश की उम्मीद अभी बाकी है,
शुक्र है की अभी आंसुओं ने 
जिंदा रखा है हमें 
वरना हम भी इस जहाँ के 
एक और बुत हो गए होते।

   
 

1 comment:

रूप said...

आँसू जो मिले अब उन्हें इनआम जानिये
इस ज़िन्दगी में और कुछ हासिल ही नहीं है,
ये सोच कर ही होठ पर हँसने लगी हँसी
पगडंडियाँ चलती तो हैं मंज़िल ही नहीं है,
बदले कोई किसी को ये मुमकिन ही कहाँ है
ये कोशिशें तो सिर्फ़ लकीरें हैं रेत पर,
जो हो सके तो खुद को बदलने की बात कर
ठोकर जो लगे गिर कर के सँभलने की बात कर.
"रूप" ७ जुलाई २०१२