Monday, June 18, 2012

कैद

कब तक खुद में कैद रहोगे,
बाहर आकर देखो तुम  
जीवन की राहों में कभी 
खुद से टकरा कर देखो तुम  
काई लगी इन दीवारों में 
कब तक खुद में फिसलोगे 
मन के जंगले से ही सही 
लेकिन  बाहर झाँक के देखो तुम 
कभी तो कुछ पहचान के देखो तुम 
जंग लगी इन चिटकनियों  को 
कभी तो खोल के देखो तुम 
शायद डर भी जाओगे 
लेकिन बाहर झांक के देखो तुम 
बाहर की गरम रेत  पर  
कभी तो चल कर देखो तुम
घरौंदे रेत के बनाकर देखो तुम 
शायद वो बह भी जायेंगे  
फिर भी लहरों से लड़ते रहना तुम 
एक दिन वो भी थक जायेंगी 
बस एक बार तो अपनी कैद से निकलो तुम 
खुद को खुद से छिटकने दो 
शायद बिखर भी जाओगे 
लेकिन बंटने  से तो अच्छा है बिखर जाना 
कोई छोर न पकड़ पायेगा तुम्हारे विस्तार का 
हर ओर रहोगे  तुम 
बस एक बार तो अपनी कैद से निकलो 
बाहर आकार देखो तुम ।


3 comments:

RAMA SHANKER SINGH said...

आपका ब्लॉग पढ़ा ... अपने ही द्वारा बनाई चार दीवारी से आजादी पाना बहुत मुश्किल काम है.. लेकिन एक बार हिम्मत कर ले तो चीज़ें आसान हो जाती हैं.. टूटना एक प्रकार से व्यक्तित्व का विस्तार भी हो सकता है.. यह पढ़कर काफी अच्छा लगा... मध्यकाल में सूफी कवियों ने ऐसा ही कुछ कहा था..
अपने इस ब्लॉग को जारी रखिये ....
रमा शंकर

RAMA SHANKER SINGH said...

आपका ब्लॉग पढ़ा ... अपने ही द्वारा बनाई चार दीवारी से आजादी पाना बहुत मुश्किल काम है.. लेकिन एक बार हिम्मत कर ले तो चीज़ें आसान हो जाती हैं.. टूटना एक प्रकार से व्यक्तित्व का विस्तार भी हो सकता है.. यह पढ़कर काफी अच्छा लगा... मध्यकाल में सूफी कवियों ने ऐसा ही कुछ कहा था..
अपने इस ब्लॉग को जारी रखिये ....
रमा शंकर

Unknown said...

kavitaon ki jaankaari kum hai humein, par ise padh kar accha laga.. likhte rahiye