कोई तो टुकड़ा
ज़िन्दगी !
तू मुझे यूँ बहलाने की कोशिश मत कर
ये वर्षों के खिलौने बहुत नाजुक हैं
जिसे भी हाथ लगाऊँ
टुकड़ों में बिखर जाता है।
अब इन मुँह चिढ़ाते टुकड़ों को
उम्र कैसे कह दूँ मैं
सखी, कोई तो टुकड़ा
वक़्त के पाँव में चुभ कर
फ़र्श को लाल कर दे !
ज़िन्दगी !
तू मुझे यूँ बहलाने की कोशिश मत कर
ये वर्षों के खिलौने बहुत नाजुक हैं
जिसे भी हाथ लगाऊँ
टुकड़ों में बिखर जाता है।
अब इन मुँह चिढ़ाते टुकड़ों को
उम्र कैसे कह दूँ मैं
सखी, कोई तो टुकड़ा
वक़्त के पाँव में चुभ कर
फ़र्श को लाल कर दे !
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