भूख खड़ी है हाथ फैलाये
शर्म हो रही शर्मिंदा
ये चौराहे कुछ कहते रहते हैं
इनको कौन सुने और कब तक,
आबादी ने मार दिया है इंसानों को
अब इंसानियत कैसे और कब तक,
नटखट बच्चे नट हो गए
सारी कला खड़ी है भूख मिटाने
चौराहे पर,
कौन है दोषी, निर्दोष कौन
सब एक राह में खड़े हैं
बस एक की शर्म, शिकार है मजबूरी का
तो दुसरे को शर्म है उस मजबूरी पर,
तुम ही बताओ अब दोषी कौन!
शर्म हो रही शर्मिंदा
ये चौराहे कुछ कहते रहते हैं
इनको कौन सुने और कब तक,
आबादी ने मार दिया है इंसानों को
अब इंसानियत कैसे और कब तक,
नटखट बच्चे नट हो गए
सारी कला खड़ी है भूख मिटाने
चौराहे पर,
कौन है दोषी, निर्दोष कौन
सब एक राह में खड़े हैं
बस एक की शर्म, शिकार है मजबूरी का
तो दुसरे को शर्म है उस मजबूरी पर,
तुम ही बताओ अब दोषी कौन!
1 comment:
कविता तब तक कविता नहीं है , जब तक वह लिखने वाले , पढने वाले और जिसके बारे में लिखा जा रहा है , को समानुभूति के धरातल पर न ले आये .. यह कोई सैद्धांतिकी नहीं है इसे मैंने कई बार महसूस किया है... आपकी यह कविता कुछ ऐसी ही है ...
इस कविता को एक बार से अधिक पढ़ा जा सकता है ....
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