Monday, July 16, 2012

मन की कसौटी

मैं घर से बाहर कैसे जाऊँ
बाहर जाकर अपने आप को इंसान मैं कुछ कम पाती  हूँ ,
सब पाठ पढ़ाते हैं 'ईको फ्रेंड्ली' होने का
लेकिन उसकी राह में जो खेल हैं भावनाओं के
उनके लिये भी तो हमें तैयार कर दो ,
रिक्शा कैसे करूँ?
वृद्ध को लूं या मज़बूत को ?
वृद्ध को छोडूँ, तो वो भूखा,
उसको बुलाऊँ तो मैं बोझ,
पैसे भी कम हैं
कि मैं उसे देकर किसी और के साथ चली जाऊँ,
इसका हल कैसे निकालूँ
इसकी गणित मैं कैसे बिठाऊँ
स्कूल कॉलेजों  ने इसका  प्रशिक्षण तो दिया ही नहीं,
नीतिकार भी इसे शामिल करना भूल गये,
हिग्स बोसोन मिले न मिले
पर अब जब इंसान बन ही चुके हैं
तो इंसानियत को तो बचा ही लो,
क्यों हर बार संवेदनशीलता खड़ी मिले कसौटी पर !!
 

1 comment:

RAMA SHANKER SINGH said...

कविता तब तक कविता नहीं है , जब तक वह लिखने वाले , पढने वाले और जिसके बारे में लिखा जा रहा है , को समानुभूति के धरातल पर न ले आये .. यह कोई सैद्धांतिकी नहीं है इसे मैंने कई बार महसूस किया है... आपकी यह कविता कुछ ऐसी ही है ...
इस कविता को एक बार से अधिक पढ़ा जा सकता है ....यही बात आपकी कविता भूखे चौराहे के लिए भी सही है..
खूब लिखिए ....