एक बार जब सुबह हुई थी,
आस्था के शंख गूँज रहे थे ,
गेरुए आकाश में, कुछ पंछी
कहीं दूर के लिए उड़े थे।
रास्ते में शाम हो गई,
उन्हें घर वापस नहीं आना था,
वे कुछ सोच कर उड़े थे,
कहीं तो उन्हें जाना था।
उस रोज़ बहुत देर तक
सुबह नहीं हुई,
वे उड़ पड़े अँधेरे में ही,
टकराते, चोट खाते,
जाने ऐसा कहाँ उन्हें जाना था।
शायद पहुँच भी गए थे,
फिर एक शाम,
वे घर आये तो ज़रूर,
मगर उनकी आँखें कुछ पथराई सी थीं,
पंख बहुत अलसाए से थे,
न जाने कहाँ से होकर आये थे।
चलो इन्हें अब सोने देते हैं,
शायद फिर कभी जब सुबह होगी,
आस्था के शंख फिर गूंजेंगे,
तो फिर गेरुए आकाश में
ये पंछी उड़ान भरेंगे।
मगर इस बार इन्हें हम
बहुत दूर नहीं जाने देंगे,
बहुत दूर नहीं जाने देंगे।।
आस्था के शंख गूँज रहे थे ,
गेरुए आकाश में, कुछ पंछी
कहीं दूर के लिए उड़े थे।
रास्ते में शाम हो गई,
उन्हें घर वापस नहीं आना था,
वे कुछ सोच कर उड़े थे,
कहीं तो उन्हें जाना था।
उस रोज़ बहुत देर तक
सुबह नहीं हुई,
वे उड़ पड़े अँधेरे में ही,
टकराते, चोट खाते,
जाने ऐसा कहाँ उन्हें जाना था।
शायद पहुँच भी गए थे,
फिर एक शाम,
वे घर आये तो ज़रूर,
मगर उनकी आँखें कुछ पथराई सी थीं,
पंख बहुत अलसाए से थे,
न जाने कहाँ से होकर आये थे।
चलो इन्हें अब सोने देते हैं,
शायद फिर कभी जब सुबह होगी,
आस्था के शंख फिर गूंजेंगे,
तो फिर गेरुए आकाश में
ये पंछी उड़ान भरेंगे।
मगर इस बार इन्हें हम
बहुत दूर नहीं जाने देंगे,
बहुत दूर नहीं जाने देंगे।।
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