Monday, July 30, 2012

कुछ पंछी उड़े थे

एक बार जब सुबह हुई थी,
आस्था के शंख  गूँज रहे थे ,
गेरुए आकाश में, कुछ पंछी
कहीं दूर के लिए उड़े थे।
रास्ते में शाम हो गई,
उन्हें घर वापस नहीं आना था,
वे कुछ सोच कर उड़े थे,
कहीं तो उन्हें जाना था।
उस रोज़ बहुत देर तक
सुबह नहीं हुई,
वे उड़ पड़े अँधेरे में ही,
टकराते, चोट खाते,
जाने ऐसा कहाँ उन्हें जाना था।
शायद पहुँच भी गए थे,
फिर एक शाम,
वे घर आये तो ज़रूर,
मगर उनकी आँखें कुछ पथराई सी थीं,
पंख बहुत अलसाए से थे,
न जाने कहाँ से होकर आये थे।
चलो इन्हें अब सोने देते हैं,
शायद फिर कभी जब सुबह होगी,
आस्था के शंख फिर गूंजेंगे,
तो फिर गेरुए आकाश में
ये पंछी उड़ान भरेंगे।
मगर इस बार इन्हें हम 
बहुत दूर नहीं जाने देंगे,
बहुत दूर नहीं जाने देंगे।।

Monday, July 16, 2012

मन की कसौटी

मैं घर से बाहर कैसे जाऊँ
बाहर जाकर अपने आप को इंसान मैं कुछ कम पाती  हूँ ,
सब पाठ पढ़ाते हैं 'ईको फ्रेंड्ली' होने का
लेकिन उसकी राह में जो खेल हैं भावनाओं के
उनके लिये भी तो हमें तैयार कर दो ,
रिक्शा कैसे करूँ?
वृद्ध को लूं या मज़बूत को ?
वृद्ध को छोडूँ, तो वो भूखा,
उसको बुलाऊँ तो मैं बोझ,
पैसे भी कम हैं
कि मैं उसे देकर किसी और के साथ चली जाऊँ,
इसका हल कैसे निकालूँ
इसकी गणित मैं कैसे बिठाऊँ
स्कूल कॉलेजों  ने इसका  प्रशिक्षण तो दिया ही नहीं,
नीतिकार भी इसे शामिल करना भूल गये,
हिग्स बोसोन मिले न मिले
पर अब जब इंसान बन ही चुके हैं
तो इंसानियत को तो बचा ही लो,
क्यों हर बार संवेदनशीलता खड़ी मिले कसौटी पर !!
 

भूखे चौराहे

भूख खड़ी है हाथ फैलाये
शर्म हो रही शर्मिंदा
ये चौराहे कुछ कहते रहते हैं
इनको कौन सुने और कब तक,
आबादी ने मार दिया है इंसानों को
अब इंसानियत कैसे और कब तक,
नटखट बच्चे नट हो गए
सारी कला खड़ी है भूख मिटाने
चौराहे पर,
कौन है दोषी, निर्दोष कौन
सब एक राह में खड़े हैं
बस एक की शर्म, शिकार है मजबूरी का
तो दुसरे को शर्म  है उस मजबूरी पर,
तुम ही बताओ अब दोषी कौन!
 

Saturday, July 7, 2012

बुतों की दुनिया

जज़्बा तो था कि बहुत कुछ 
बदल के जायेंगे,
कुछ पगडंडियों को पक्का 
रास्ता कर के जायेंगे,
जिधर से जायेंगे
मुस्कुरा के जायेंगे,
लेकिन ये क्या हुआ की मुस्कुराने 
के लिए चेहरे बचे नहीं,
कुछ ज़माना हमे तो कुछ हम 
ज़माने को जचे नहीं,
फिर भी हैरानी है की 
कोशिश की उम्मीद अभी बाकी है,
शुक्र है की अभी आंसुओं ने 
जिंदा रखा है हमें 
वरना हम भी इस जहाँ के 
एक और बुत हो गए होते।