Monday, June 18, 2012

कैद

कब तक खुद में कैद रहोगे,
बाहर आकर देखो तुम  
जीवन की राहों में कभी 
खुद से टकरा कर देखो तुम  
काई लगी इन दीवारों में 
कब तक खुद में फिसलोगे 
मन के जंगले से ही सही 
लेकिन  बाहर झाँक के देखो तुम 
कभी तो कुछ पहचान के देखो तुम 
जंग लगी इन चिटकनियों  को 
कभी तो खोल के देखो तुम 
शायद डर भी जाओगे 
लेकिन बाहर झांक के देखो तुम 
बाहर की गरम रेत  पर  
कभी तो चल कर देखो तुम
घरौंदे रेत के बनाकर देखो तुम 
शायद वो बह भी जायेंगे  
फिर भी लहरों से लड़ते रहना तुम 
एक दिन वो भी थक जायेंगी 
बस एक बार तो अपनी कैद से निकलो तुम 
खुद को खुद से छिटकने दो 
शायद बिखर भी जाओगे 
लेकिन बंटने  से तो अच्छा है बिखर जाना 
कोई छोर न पकड़ पायेगा तुम्हारे विस्तार का 
हर ओर रहोगे  तुम 
बस एक बार तो अपनी कैद से निकलो 
बाहर आकार देखो तुम ।


Thursday, June 14, 2012

THE COMING AND THE GOING

WHEN YOU CAME, IT LOOKED LIKE A GOOD TIME,
WHEN YOU WENT, IT AGAIN LOOKED  LIKE A GOOD TIME,
OF COURSE WITH A RIDER;
YOU CAME BACK, IT FELT GOOD, 
REGARDLESS OF THE CIRCUMSTANCES;
YOU WENT BACK, GOOD TIME IT INDEED APPEARED AGAIN,
GIVEN THE CONDITIONS;
HEY WAIT A MINUTE!
WHAT ABOUT THE TIMES IN BETWEEN??
NOT SO GOOD, NOT SO BAD.
NOW HERE I WONDER WHY WAS THE COMING AND THE GOING
ALWAYS GOOD AND NEVER BAD!!
DO WE CALL THAT IRONY?
WE KNOW ALL THE ANSWERS,
YET WE POSE QUESTIONS;
WE WANT OTHERS TO ANSWER THEM FOR US,
IT SOOTHES THE PAIN,
IN SOOTH WE DO NOT WANT TO RELIVE THE MOMENTS
TO ANSWER THEM FOR OURSELVES. 


 
 
 

Sunday, June 10, 2012

पागलपन

 कुछ लोग  मुझे कहते थे पागल 
वो कहते थे मुझे जान गए 
मैंने सच बोला पागलपन से 
मैंने हिम्मत की पागलपन की 
वो कौन थे लोग जो कहते थे मुझे जान गए 
मुझे जानने  में तो ज़रूरत थी पागलपन की।

सपनों के साथ

 कुछ झूठे रिश्ते, कुछ सच्ची यादें 
कुछ ख़ुशी के झूठे वादे, कुछ सच्चे दर्द हक़ीक़त  के 
जब दोस्त कहो किसी को तो 
दोस्ती को उससे बड़ा कर दो 
और छूट जाये जब साथ कोई 
तो उसको खुद में समा के चलो 
कोई साथ चले न चले जीवन में 
तुम सबको साथ लिए चलना 
कुछ ज़ेहन में मीठी याद लिए 
कुछ कड़वे सच की बात लिए 
जब लगे कुछ टूटा सा जीवन में 
जब लगे कुछ  छूटा  सा जीवन में  
तब सपनों को और बड़ा कर दो 
सपनों सा जीवन और कहीं 
जीवन के सपने और कहीं 
सपनों के आगे सब कम है 
बस मान लो सपना जीवन है 

पाश की कुछ अनुवादित कवितायें

 
 कोई तो टुकड़ा

ज़िन्दगी !
तू मुझे यूँ बहलाने की कोशिश मत कर
ये वर्षों के खिलौने बहुत नाजुक हैं
जिसे भी हाथ लगाऊँ
टुकड़ों में बिखर जाता है।
अब इन मुँह चिढ़ाते टुकड़ों को
उम्र कैसे कह दूँ मैं
सखी, कोई तो टुकड़ा
वक़्त के पाँव में चुभ कर
फ़र्श को लाल कर दे !

वफ़ा

वर्षों तड़पकर तेरे लिए 
मैं भूल गया हूँ कब से
अपनी आवाज़ की पहचान
भाषा जो मैंने सीखी थी, मनुष्य जैसा लगने के लिए
मैं उसके सारे अक्षर जोड़ कर भी
मुश्किल से तेरा नाम ही बना सका
मेरे लिए वर्ण अपनी ध्वनि खो बैठे बहुत देर से
मैं अब लिखता नहीं–
तेरे धुपहले अंगों की मात्र परछाईं पकड़ता हूँ
कभी तूने देखा है– लकीरों को बगावत करते ?
कोई भी अक्षर मेरे हाथों से
तेरी तस्वीर ही बनकर निकलता है
तू मुझे हासिल है(लेकिन) कदम भर की दूरी से
शायद यह कदम मेरी उम्र से नही
मेरे कई जन्मों से भी बड़ा है
यह कदम फैलते हुए लगातार
घेर लेगा मेरी सारी धरती को
यह कदम माप लेगा मृत आकाशों को
तू देश में ही रहना
मैं कभी लौटूँगा विजेता की तरह तेरे आँगन में
इस कदम को या मुझे
ज़रूर दोनों में से किसी को क़त्ल होना पडे़गा।



                                                            - पाश