मैं आज फिर लिख रही हूँ
मैं जानती हू मेरी लेखन में
कोई रचनात्मक बात नहीं होती
मैं जानती हू मेरी लेखन में
कोई बडी बात भी नहीं होती
मैं जानती हू मैं कोई क्रांतिकारी बात
भी नही कह पाती
मैं तो बस लिखती हूँ .
मैं लिखती हूँ कि मेरा
खुद से नाता बना रहे
मैं लिखती हूँ कि मेरा
खुद से संवाद होता रहे
मैं लिखती हूँ कि मेरी
सोच मुझसे दूर न हो जाये
मैं लिखती हूँ कि कहीं कुछ
क्षणिक भावनाओं की अनदेखी न हो जाये
मैं लिखती हूँ कि
एक दिन जब पन्ने पलटने बैठूं
तो खुद को पढ़ सकूं
बस इसीलिये
मैं लिखती हूँ
मैं जानती हू मेरी लेखन में
कोई रचनात्मक बात नहीं होती
मैं जानती हू मेरी लेखन में
कोई बडी बात भी नहीं होती
मैं जानती हू मैं कोई क्रांतिकारी बात
भी नही कह पाती
मैं तो बस लिखती हूँ .
मैं लिखती हूँ कि मेरा
खुद से नाता बना रहे
मैं लिखती हूँ कि मेरा
खुद से संवाद होता रहे
मैं लिखती हूँ कि मेरी
सोच मुझसे दूर न हो जाये
मैं लिखती हूँ कि कहीं कुछ
क्षणिक भावनाओं की अनदेखी न हो जाये
मैं लिखती हूँ कि
एक दिन जब पन्ने पलटने बैठूं
तो खुद को पढ़ सकूं
बस इसीलिये
मैं लिखती हूँ
3 comments:
ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि छंद म्रत्यु से बचा लेते हैं . वागीश शुक्ल ने लिखा है कि साहित्य म्रत्यु से सामना करने की विधि है . इसी तरह से लिखना अपने आप से मिलना है ... अपने से मिलने का समय निकालिए और खूब लिखिए ....
experience and experimental in writing, it means a lot..
बड़ी बात तो ये है कि
कोई मन लिखने की बात सोच लेता है,
कोई हाथ आगे बढ़ कर कलम उठा लेता है,
कुछ शब्द विचार की कन्दराओं से निकल कर झाँक लेते हैं,
कुछ लफ्ज़ सफ़ेद चादरों पर अल्पना की तरह पसर जाते हैं,
जिनके सतरंगे आयाम खुद को एक स्मरणीय एहसास से भर जाते हैं.... सदा के लिए....
Post a Comment