Thursday, August 29, 2013

उड़ता हुआ पत्ता

मुझे  बहुत तेज़ चलना था 
उड़ जाना था
पलटकर कभी नहीं देखना था।  
मैं अपना रास्ता जानती थी 
दूर तक सोच लेती थी। 
जीवन की राहों को अपने मस्तिष्क पर 
हाथों की लकीरों की तरह खींच लेती थी।  
कुछ दूर तक  उन लकीरों  के सहारे आगे बढ़ी भी। 
गुमान भी किया 
कि जैसा सोचा वही हुआ। 
फिर एक दिन जीवन की दीवार पर लगी 
एक ऐसी खिड़की खुली 
जिसपर मेरा ध्यान नहीं गया था। 
बहुत तेज़ हवा चलने लगी 
मौसम ठीक नहीं था। 
ऐसा लगा जैसे 
किसी उड़ते हुए पत्ते को एक तेज़ आँधी ने 
हवा में लपेटकर किसी दीवार पर 
जा पटका हो और वो 
चाह कर भी उस दीवार से 
छूट न पा रहा हो हवा के जोर के कारण। 
आँधी थमी तो उस पत्ते की तरह 
मैं भी धीरे से दीवार से खिसक कर 
ज़मीन पर बैठ गई। 
हवा के थपेड़ों का असर 
हमेशा महसूस होता रहा 
लेकिन 
मैं ठहर कर चलना सीख गई। 


2 comments:

Unknown said...

excellent,..superb.. taru..I think everyone perceive this in their real life (somewhere n some time).. and must have experience n learn from it..

rashmi said...

hey....I know what it feels like and can sense it whenever we meet...the feeling is mutual but yet to hear it from yourside