Tuesday, July 9, 2013

मन की सुविधा

कभी मन चाहे पास रहें सब 
कभी मन चाहे दूर चलें कहीं 
कभी मन चाहे जीत जायें जग  
कभी मन चाहे छोड़ चलें सब 
कभी मन चाहे प्यार का बंधन 
कभी मन चाहे बेपरवाही 
भी मन चाहे ज्ञानी बनना 
कभी मन चाहे चरम अँधेरा 
कभी मन चाहे विस्तार अपार 
तो कभी मन चाहे सिमट के रहना 
कभी मन चाहे सब सुखसाधन 
कभी मन हो जाये वैरागी 
कभी मन चाहे भावुक होना 
तो कभी मन चाहे तटस्थ ही रहना 
देखो ये मन भी तो एक सुविधा ही है 
जो विकल्प दिलाता रहता है 
पसंद बताता रहता है 
सीमाएं निर्धारित करता है 
फिर अकेला, दोराहे पर छोड़ जाता है 
हाँ लेकिन ये भी तो सच है
सुविधा मन की, सबके पास कहाँ होती है। 

2 comments:

Unknown said...

very nice....too good dear :)

Unknown said...

very practical, Reality for all creature n being..