Thursday, October 17, 2013

तुम्हारे लिए

गिरते, पड़ते, लुढ़कते
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।  

Wednesday, October 9, 2013

मैं लिखती हू

मैं आज फिर लिख रही हूँ 
मैं जानती हू मेरी लेखन में 
कोई रचनात्मक  बात नहीं  होती 
मैं जानती हू मेरी लेखन में  
कोई बडी बात भी नहीं  होती
मैं जानती हू मैं कोई क्रांतिकारी बात
भी नही कह पाती
मैं तो बस लिखती हूँ . 
मैं लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से नाता बना रहे
मैं  लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से संवाद होता रहे
मैं लिखती हूँ  कि मेरी 
सोच मुझसे दूर न हो जाये 
मैं लिखती हूँ  कि कहीं कुछ 
क्षणिक भावनाओं की अनदेखी न हो जाये 
मैं लिखती हूँ कि 
एक दिन जब पन्ने पलटने बैठूं 
तो खुद को पढ़ सकूं 
बस इसीलिये
मैं  लिखती हूँ 




Friday, September 27, 2013

Mera Shehar Allahabad

kisi ne mujhse poocha
is shehar mein aur kya hai dekhne ko
main sochne lagi
bahut kuch yaad bhi aya
lekin kya karein
yaadein dikha nahi sakte
shehar jo yaadon mein basta raha
bahut dhoondha 
mila nahi
wo aitihasik ped kahin kho gaya tha
jisne apne kandhon par
maut ko saha tha
kahin wo raste
shehar ke navinikaran mein
ojhal ho gaye the,
jinpar mera bachpan chalta tha
aur to aur
haathi park ke haathi ki soond bhi toot rahi thi.
itihas ke chehre par
kahin bahut kaai lagi thi
to kahin chehra tha hi nahi.
ab koshish karti hu kisi tarah 
apne andar is shehar ko zinda rakhne ki.

raat

zara yahan bhi rukte hain
kya hoga,
thodi der hi to ho jayegi,
kya hoga zyada se zyada,
bus chhoot jayegi!
samay par laut nahin payenge!
raat ke sukoon ko main 
yahin mehsoos karna chahti hu
ruk kar, chalkar nahin,
raat kaatni nahin, jeeni hai,
kuch pal ke liye hi sahi.
raat to le leti hai khud par ilzam 
kale hone ka,
jurm ko sheh dene ka,
jeevan ke ant ka pratik hone ka
bhoot pishaach jagane ka
phir bhi hai mujhko raat lubhaati
chaand ho jata hai mujhme shamil
chal padta hai mere saath
karke mujhko azad
din ke dhong dikhawon se
dincharya ke niyamon aur ashaaon se
arre dekho! baton baton mein subah ho gai
ao ab sapne se nikalte hain
aur phir se atma chhor sharir mein palte hai.




Thursday, August 29, 2013

उड़ता हुआ पत्ता

मुझे  बहुत तेज़ चलना था 
उड़ जाना था
पलटकर कभी नहीं देखना था।  
मैं अपना रास्ता जानती थी 
दूर तक सोच लेती थी। 
जीवन की राहों को अपने मस्तिष्क पर 
हाथों की लकीरों की तरह खींच लेती थी।  
कुछ दूर तक  उन लकीरों  के सहारे आगे बढ़ी भी। 
गुमान भी किया 
कि जैसा सोचा वही हुआ। 
फिर एक दिन जीवन की दीवार पर लगी 
एक ऐसी खिड़की खुली 
जिसपर मेरा ध्यान नहीं गया था। 
बहुत तेज़ हवा चलने लगी 
मौसम ठीक नहीं था। 
ऐसा लगा जैसे 
किसी उड़ते हुए पत्ते को एक तेज़ आँधी ने 
हवा में लपेटकर किसी दीवार पर 
जा पटका हो और वो 
चाह कर भी उस दीवार से 
छूट न पा रहा हो हवा के जोर के कारण। 
आँधी थमी तो उस पत्ते की तरह 
मैं भी धीरे से दीवार से खिसक कर 
ज़मीन पर बैठ गई। 
हवा के थपेड़ों का असर 
हमेशा महसूस होता रहा 
लेकिन 
मैं ठहर कर चलना सीख गई। 


Tuesday, July 9, 2013

मन की सुविधा

कभी मन चाहे पास रहें सब 
कभी मन चाहे दूर चलें कहीं 
कभी मन चाहे जीत जायें जग  
कभी मन चाहे छोड़ चलें सब 
कभी मन चाहे प्यार का बंधन 
कभी मन चाहे बेपरवाही 
भी मन चाहे ज्ञानी बनना 
कभी मन चाहे चरम अँधेरा 
कभी मन चाहे विस्तार अपार 
तो कभी मन चाहे सिमट के रहना 
कभी मन चाहे सब सुखसाधन 
कभी मन हो जाये वैरागी 
कभी मन चाहे भावुक होना 
तो कभी मन चाहे तटस्थ ही रहना 
देखो ये मन भी तो एक सुविधा ही है 
जो विकल्प दिलाता रहता है 
पसंद बताता रहता है 
सीमाएं निर्धारित करता है 
फिर अकेला, दोराहे पर छोड़ जाता है 
हाँ लेकिन ये भी तो सच है
सुविधा मन की, सबके पास कहाँ होती है।