Thursday, December 6, 2012
Sunday, December 2, 2012
नानी तुम मेरी दादी होती
नानी तुम मेरी दादी होती
तो न जाना पड़ता तुमको मेरे घर से,
न सुनने पड़ते दुनिया के ताने,
ज़्यादा हक़ जमा पाती मैं तुम पर,
न करता आना कानी
वो बैंक वाला,
तुम्हारा अकाउंट खुलवाने में,
मेरा पता तुम्हारा पता होता,
न बनना पड़ता तुम्हे मेरा किराएदार
पता प्रमाण दिखाने के लिए,
मैं न तरसती रहती
तुम्हारे लड्डुओं के लिए
न तरसती रहती मैं
भरे पेट में भी तुम्हारी थाली से
एक निवाला चखने के लिए
न तरसती रहती मैं
तुमसे दो बातें करके सोने के लिए
नानी सुनो ना
या तो तुम इतनी अच्छी न होती
या तुम मेरी दादी होती।
तो न जाना पड़ता तुमको मेरे घर से,
न सुनने पड़ते दुनिया के ताने,
ज़्यादा हक़ जमा पाती मैं तुम पर,
न करता आना कानी
वो बैंक वाला,
तुम्हारा अकाउंट खुलवाने में,
मेरा पता तुम्हारा पता होता,
न बनना पड़ता तुम्हे मेरा किराएदार
पता प्रमाण दिखाने के लिए,
मैं न तरसती रहती
तुम्हारे लड्डुओं के लिए
न तरसती रहती मैं
भरे पेट में भी तुम्हारी थाली से
एक निवाला चखने के लिए
न तरसती रहती मैं
तुमसे दो बातें करके सोने के लिए
नानी सुनो ना
या तो तुम इतनी अच्छी न होती
या तुम मेरी दादी होती।
शामिल होना चाहती हूँ
मैं शामिल होना चाहती हूँ
खुशियों में और उपहारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
गीतों में और फनकारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
अपनों में और ज़िम्मेदारों में
मगर नहीं रहना चाहती मैं
पहरों और पहरेदारों में
नहीं रहना चाहती मैं
कुपोषित सोच के गलियारों में
ये कैसे संभव होगा
नहीं जानती मैं
फिर भी इच्छा ये कैसी
जो मोल भाव नहीं कर पाती
नियमों के तर्क नहीं समझ पाती
बस तंग सा छोड़ जाती है
खुशियों में और उपहारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
गीतों में और फनकारों में
मैं शामिल होना चाहती हूँ
अपनों में और ज़िम्मेदारों में
मगर नहीं रहना चाहती मैं
पहरों और पहरेदारों में
नहीं रहना चाहती मैं
कुपोषित सोच के गलियारों में
ये कैसे संभव होगा
नहीं जानती मैं
फिर भी इच्छा ये कैसी
जो मोल भाव नहीं कर पाती
नियमों के तर्क नहीं समझ पाती
बस तंग सा छोड़ जाती है
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