गिरते, पड़ते, लुढ़कते
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।