Thursday, October 17, 2013

तुम्हारे लिए

गिरते, पड़ते, लुढ़कते
वो आये थे,
आये थे आकाश गंगा को छोड़
दीपशिखा को छूते हुए,
उसकी लौ में चमकते हुए,
मेरे चेहरे के भाव बदलते हुए,
मेरे गालों की स्वायत्तता को नकारते हुए,
भोलेपन से
रेखाओं और सीमाओं को
काटते हुए,
बाहर आये थे मेरे मन मंथन से
दो मोती, तुम्हारे लिए।
अब या तो मैं इन्हें पोछकर
मिटा दूँ, तुम्हारे लिए,
या फिर आगे बढ़कर गिर जाने दूँ,
तुम्हारे लिये।  

Wednesday, October 9, 2013

मैं लिखती हू

मैं आज फिर लिख रही हूँ 
मैं जानती हू मेरी लेखन में 
कोई रचनात्मक  बात नहीं  होती 
मैं जानती हू मेरी लेखन में  
कोई बडी बात भी नहीं  होती
मैं जानती हू मैं कोई क्रांतिकारी बात
भी नही कह पाती
मैं तो बस लिखती हूँ . 
मैं लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से नाता बना रहे
मैं  लिखती हूँ  कि मेरा 
खुद से संवाद होता रहे
मैं लिखती हूँ  कि मेरी 
सोच मुझसे दूर न हो जाये 
मैं लिखती हूँ  कि कहीं कुछ 
क्षणिक भावनाओं की अनदेखी न हो जाये 
मैं लिखती हूँ कि 
एक दिन जब पन्ने पलटने बैठूं 
तो खुद को पढ़ सकूं 
बस इसीलिये
मैं  लिखती हूँ