बिट्टन देवी उत्तर प्रदेश की चमार जाति में आती हैं। वे इलाहाबाद शहर के एक छोटे से मोहल्ले, फतेहपुर बिछुआ की रहने वाली हैं। बिट्टन देवी लगभग 62 वर्ष की होंगी। इनके जीवन पर एक नज़र डालने से योजनाबद्ध बहिष्कार के प्रपत्र और प्रक्रिया को समझने में कुछ आसानी होगी।
बिट्टन देवी की कहानी से पहले हमें कुछ तथ्य ज़ेहन में रखना ज़रूरी है। दलित महिलाओं और उनके जीवन संघर्ष को देखने और महसूस करने के लिए हमें कहीं बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं। हमारे देश का बहुत बड़ा सच है कि हाशिये पर की गई जातियों वाली महिलाएं घरेलू कर्मचारियों के समूह का एक बड़ा हिस्सा हैं। ये सच बार बार कई रिपोर्ट्स और सर्वेज़ में उभर कर आता है। दलित महिलाएं कई प्रकार की मजबूरियों और बहिष्कार के चलते प्रतिष्ठित श्रम का हिस्सा नहीं बन पति हैं। वे मज्बूरन् दूसरों के घरों में काम करने लगती हैं, जहाँ न तो अभी तक न्यूनतम मजदूरी तय करने का कोई ठोस हल आया है और ना ही उनके और उनकी अगली पीढ़ी के लिए कोई विशेष योजनायें आयी हैं। यही कारण है की पीढ़ी दर पीढ़ी दलित महिलाएं और लड़कियां इसी काम में लगी रह जाती हैं।
अब पूर्वोक्त कथनों को ध्यान में रखते हुए बिट्टन देवी के जीवन के कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं। बिट्टन देवी के जीवन से न केवल दलित महिला होना क्या होता है ज्ञात होगा बल्कि एक दलित महिला के जीवनकाल के अलग अलग पड़ावों पर संघर्ष किस तरह बढ़ता जाता है यह भी परिलक्षित होगा।
बिट्टन देवी का कहना है की जब तक वो अपने मायेके में थीं तब तक उतनी बुरी स्थिति नहीं थी, हालाँकि उन्हें एहसास रहता था की वे एक निम्न जाति की लड़की हैं। कोई उन्हें तंग न करे और ये न सोचे की नीची जाति की होने के कारण उनसे कुछ भी करवाया जा सकता है, इसलिए वे अपने कपड़ों और रेहान सेहन के माध्यम से हमेशा संकेत देती थीं की वे गंभीर स्वभाव की हैं और उन्हें गलत न समझे।
बिट्टन देवी का विवाह राजा राम नाम के आदमी के साथ हुआ। छह माह तक तो कुछ ठीक चला जीवन लेकिन उसके बाद राजा राम के चोट लगने के कारण वे काम काज करने में असमर्थ हो गए। अब बिट्टन देवी को कोई घर में नहीं रखना चाहता था। बिट्टन देवी को किसी ने एक अस्पताल में लगवा दिया। वहां उनकी ड्यूटी प्रसूति विभाग में लगती थी। उन्हें सैनिटरी पैड बनाने और धोने का काम दिया जाता था। वहां उन्हें 75 रुपये महिना मिलता था। बिट्टन देवी उसमे से पांच रुपये रखकर बाकी का 70 रपया अपने ससुराल वालों को दे देती थीं लेकिन ससुराल वालों को ये भी मंज़ूर नहीं था। उनका कहना था की या तो वो पूरा 75 रपये दे दिया करें या घर छोड़ कर चली जायें। बिट्टन देवी पूरा पैसा देने लगीं। कुछ समय बाद बिट्टन देवी ने एक बेटी को जन्म दिया और तब से तो उनकी परेशानियां और बढ़ गईं। ससुराल्वाले अब तो उन्हें घर में बिल्कुल नहीं रहने देना चाह रहे थे। उनके सिर पर भरी भरकम चीज़ों से वार करना और बाल पकड़कर सर्दियों में घर से बहार फ़ेंक देने का सिलसिला शुरू हो गया था। उनका अस्पताल वाला काम भी छूट हया था।
एक बार बिट्टन देवी कुछ काम से बहार गई हुई थीं तब उनके ससुराल वाले उनके पति घर का एक एक सामान ख़ाली करके, सारा राशन और पैसा लेकर कहीं दूसरी जगह रहने चले गए। उन्हें लगा की बिट्टन देवी अब बिना राशन-पानी के अकेले अपने बच्चों के साथ कैसे रह पाएंगी और अपने मायेके चली ही जाएँगी। बिट्टन देवी के उस वक़्त तक और बच्चे हो चुके थे जो की बहुत छोटे थे। उनके पास बच्चों को लिटाने और उढ़ाने के लिए भी कुछ नहीं बचा था। बिट्टन देवी के पास कुछ बोरियां और अस्पताल से मिली एक आध साड़ी बची थी जिसे उन्होंने काट काट कर कथरी बनायीं बच्चों के लिए। बिट्टन देवी को अस्पताल के प्रसूति विभाग में सैनिटरी पैड बनाने के लिए साड़ियाँ मिलती थीं।
अब बिट्टन देवी के पास न तो परिवार था और न पैसा जीवन यापन के लिए। उनके पास दूसरों के घरों में काम करने के इलावा और कोई चारा नहीं बचा था। बिट्टन देवी के अनुसार निर्धन दलित महिलाएं ज़्यादातर अपने आस पास के घरों में ही काम कर पति हैं। वे बड़े बाज़ारों या संस्थानों में काम के लिए बहुत कम जा पति हैं क्योंकि महिला होने के कारन वैसे ही उनकी कई सीमाएं होती हैं, ऊपर से दलित महिला के साथ तो लोग पशुवत व्यवहार करने से नहीं हिचकते। बिट्टन देवी ने घरों में काम करना शरू किया और धीरे धीरे उनकी बेटियों ने भी उनके साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। इसी प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर ये काम बहुत ही पूर्वनियत तरीके से लदता चला जाता है।
बिट्टन देवी के पति राजा राम कुछ समय बाद लौट आये। वे जो कुछ भी कमा पति थीं, उनके पति पूरा का पूरा ले लेते थे। बिट्टन देवी याद करती हैं कि एक चीज़ के लिए राजा राम ज़रूर पैसा दे दिया करते थे। वे जब बीमार पड़ जाती थीं तब दवा का पैसा ज़रूर दिया करते थे, कि कहीं काम न बंद हो जाये बीमारी के कारण।
बिट्टन देवी बताती हैं कि शादीशुदा होने के बाद भी वे कभी सौंदर्य सामग्री का इस्तेमाल नहीं करती थीं और उन्ही के शब्दों में कहें तो 'टिकली ' भी लगाकर सड़क पर नहीं जाती थीं। बिट्टन देवी का कहना है की नीची जाती का होने के कारन बहुत होशियार होकर रहना पड़ता है लोगों की नज़रों से बचने के लिए।
बिट्टन देवी जिस मोहल्ले में रहती हैं वहां मुख्यरूप से अहीर, पासी, चमार, कहार और नाइ समुदाये के लोगों की आबादी है। इनके इलावा कुछ बनिया भी बसने लगे हैं। इस मोहल्ले में करीब करीब सभी दलित महिलाएं घरेलू कर्मचारी हैं - कुछ पूरे दिन की तो कुछ सुबह-शाम की। दलित पुरुष यहाँ के न के बराबर दूसरों के घरों में काम करते हैं। पुरुष ज़्यादातर 'टकाई' या 'जूता घांठने' का काम करते हैं।
दलित महिला एक महिला होने के साथ साथ दलित होने, फिर शादी के बाद बहू होने और उसके इलावा योजनाबद्ध बहिष्कार के चलते चौतरफा मार झेलती हैं। हम अपने इर्द गिर्द इस प्रकार की घरों में काम करने वाली महिलाओं को अक्सर देखते हैं और बड़ी आम सी बात लगती है लेकिन जब हम उनमें से किसी के जीवन और उसके पीछे के कारणों का आंकलन करने बैठते हैं तब पर्त दर पर्त समाज की अतार्किक वास्तविकताएं सामने आने लगती हैं।
वैसे तो नीची जाति का होना अपने आप में एक श्राप होता है फिर भी पुरुष कम से कम बाहर के काम करके खुली हवा तो महसूस कर पते हैं लेकिन घरेलु कर्मचारी जो कि ज़्यादातर दलित महिलाएं हैं वे अपने घरों से निकल कर सीधे दूसरों के घरो में वही काम करने चली जाती हैं।
एक फैक्ट फैन्डिंग मिशन रिपोर्ट राजिस्थान की दलित महिलाओं पर निकली गई थी, "प्रोग्रैम ऑन विमेंस इकनॉमिक, सोशल ऐंड कल्चरल राइट्स" के द्वारा, 2008 में। उस रिपोर्ट में उल्लिखित था कि दुनिया के सभी देशों में ऐसे सम्प्रदाए हैं जो समाज में अपनी स्थिति के कारण लगातार हाशिये पर रखे जा रहे हैं और यह भेद-भाव दलित महिलाओं के सम्बन्ध में अत्यंत व्यवस्थित रूप में है, जो उनके निर्धन, दलित और महिला होने के नाते उनका बहिष्करण और उनकी परवशता सुनिश्चित करता है।
मानवाधिकार परिषद् द्वारा 10 से 28 सितम्बर 2012 के बीच अयोजित इक्कीसवे सत्र में 'ईकोसॉक' (इकोनॉमिक ऐंड सोशल काउंसिल) से परामर्शी दर्ज़ा प्राप्त एक एन. जी. ओ., "इन्टरनैशन मूंवमेंट अगेन्स्ट ऑल फोर्म्स ऑफ़ रेसिज़म ऐंड डिस्क्रिमिनेशन", द्वारा लिखित बयान प्रस्तुत किया गया। इसमें कहा गया की असंगठित कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा बिल को बिना किसी विल्लंभ के पारित कर देना चाहिए और दलित महिला घरेलू कर्मचारियों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए। दलित कर्मचारियों व नियमों पर सन् 2011 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मलेन में दिए गए उपायों को भी लागू करने की मांग की गई है।