मुझे बहुत तेज़ चलना था
उड़ जाना था
पलटकर कभी नहीं देखना था।
मैं अपना रास्ता जानती थी
दूर तक सोच लेती थी।
जीवन की राहों को अपने मस्तिष्क पर
हाथों की लकीरों की तरह खींच लेती थी।
कुछ दूर तक उन लकीरों के सहारे आगे बढ़ी भी।
गुमान भी किया
कि जैसा सोचा वही हुआ।
फिर एक दिन जीवन की दीवार पर लगी
एक ऐसी खिड़की खुली
जिसपर मेरा ध्यान नहीं गया था।
बहुत तेज़ हवा चलने लगी
मौसम ठीक नहीं था।
ऐसा लगा जैसे
किसी उड़ते हुए पत्ते को एक तेज़ आँधी ने
हवा में लपेटकर किसी दीवार पर
जा पटका हो और वो
चाह कर भी उस दीवार से
छूट न पा रहा हो हवा के जोर के कारण।
आँधी थमी तो उस पत्ते की तरह
मैं भी धीरे से दीवार से खिसक कर
ज़मीन पर बैठ गई।
हवा के थपेड़ों का असर
हमेशा महसूस होता रहा
लेकिन
मैं ठहर कर चलना सीख गई।
उड़ जाना था
पलटकर कभी नहीं देखना था।
मैं अपना रास्ता जानती थी
दूर तक सोच लेती थी।
जीवन की राहों को अपने मस्तिष्क पर
हाथों की लकीरों की तरह खींच लेती थी।
कुछ दूर तक उन लकीरों के सहारे आगे बढ़ी भी।
गुमान भी किया
कि जैसा सोचा वही हुआ।
फिर एक दिन जीवन की दीवार पर लगी
एक ऐसी खिड़की खुली
जिसपर मेरा ध्यान नहीं गया था।
बहुत तेज़ हवा चलने लगी
मौसम ठीक नहीं था।
ऐसा लगा जैसे
किसी उड़ते हुए पत्ते को एक तेज़ आँधी ने
हवा में लपेटकर किसी दीवार पर
जा पटका हो और वो
चाह कर भी उस दीवार से
छूट न पा रहा हो हवा के जोर के कारण।
आँधी थमी तो उस पत्ते की तरह
मैं भी धीरे से दीवार से खिसक कर
ज़मीन पर बैठ गई।
हवा के थपेड़ों का असर
हमेशा महसूस होता रहा
लेकिन
मैं ठहर कर चलना सीख गई।